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फ़ैसला -2

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फैसला। फैसला तो आया लेकिन ऐसा फैसला जिस पर खुद भाजपा समर्थकों व सत्ता में बैठे लोगों को भरोसा नहीं हो रहा था। वे यह जान तो रहे थे कि किस चतुराई से तमाम रंगो में से केसरिया और हरा को उभार दिया गया था कि बाकी रंग झूठ और अफवाह के बादल तले दब जाये। देश को दो रंगा करने की कोशिश एक बार फिर सफल हो गया था। यह वक्त यह सवाल पूछने का नहीं है कि यह दो रंग हमेशा रहेगा। सवाल तो यह है कि अदृश्य सतरंगी तो सफेद था जिस पर दोनों रंगो को जोड़कर रखने का माद्दा था वह कैसे छूट गया। और यदि उसे जानबुझकर हटा दिया जायेगा तो क्या लोकतंत्र बेरंग नहीं हो जायेगा। जहां भी वह अदृश्य सतरंगी नहीं है वहाँ के हालात क्या है? क्या सिर्फ दो रंगो के सहारे ही लोकतंत्र जिन्दा रह पायेगा। लेकिन वर्तमान का सच तो यही है कि इन दो रंगों के सहारे ही लोकतंत्र को मजबूत बनाने के भ्रम को जिन्दा रखने की कोशिश की जा रही है। आप किसी को एक बार और बहुत हुआ तो दो बार ही बेवकुफ बना सकते हैं। बार-बार बेवकूफ आप नहीं बना सकते। ऐसे में जब एक बार फिर यह फैसला आया है तब क्या आने वाले वक्त में स्वयं को साबित करना चुनौती नहीं होगा? इस देश के लोकतंत्र...

बदलाव

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बदलाव... यह वक्त घड़ी की सुईयों को उल्टा घुमाने का भी है क्योंकि दो हजार चौदह में भाजपा को जो सत्ता मिली थी उसकी प्रमख वजह अन्ना-बाबा द्वारा कांग्रेस के खिलाफ खड़ा किया हुआ आन्दोलन भले रहा हो लेकिन भाजपा की जीत में प्रमुख भूमिका निभाने में वे लोग भी थे जो भारतीय जनता पाटी का चेहरा बन चुके थे। इनमें लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, सुमित्रा महाजन, शत्रुघन सिन्हा, नवजोत सिंह सिद्धू, अरूण शौरी, रमेश बैस, यशवंत सिंहा, कलराज मिश्र, शांता कुमार, मनोहर पर्रिकर जैसे और भी दर्जनों नाम थे जो या तो देश में भाजपा के चेहरे थे या अपने अपने प्रदेश में। इन चेहरों का प्रभाव से इंकार करने का मतलब क्या होना चाहिए और ये चेहरे दो हजार उन्नीस में क्यों नहीं चुनाव लड़ रहे हैं। दरअसल मोदी ने जब सत्ता संभाली तो उनके सामने पाटी के भीतर भी बड़ी चुनौती थी क्योंकि मोदी पहली बार केन्द्र की राजनीति में आये थे जबकि इससे पहले इन तमाम लोगों ने केन्द्र की राजनीति में अपने को स्थापित कर चुके थे। ऐसे में इनकी सरकार को लेकर कोई भी बात महत्वपूर्ण मानी जाती थी और असंतुष्ट सांसदों का जमावड़ा भी...

आत्म-मुग्ध -2

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तारीख सिर्फ उनसे प्यार करती है जो उस पर हावी होते है और वह दौर नरेन्द्र मोदी से चाहत का दौर था। वह एक अहम शख्यियत बन चुका था। कांग्रेस से न उम्मीद लोगों की वे उम्मीद थे। अच्छे दिन आयेंगे इस जुमले को उन्होंने बखूबी इस्तेमाल किया था। नेहरू गांधी को निशाना बनाते हुए वह कांग्रेस मुक्त भारत का जब वे दावा करते थे तो बहुत से वे लोग भी डर जाते थे जिन्हे राजनीति से कोई लेना देना  नहीं है लेकिन लोकतंत्र के लिए दमदार विपक्ष की भूमिका की जरूरत महसूस करते थे। इसलिए भाजपा की जीत के बाद आसमान छूती जन उम्मीद के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बने तो भाजपा और आरएसएस के अलावा दूसरे हिन्दू संगठनों ने यह जयघोष कर दिया कि आजादी के 70 साल बाद पहली बार हिन्दू प्रधानमंत्री बना अब हिन्दू राज की राह में कोई बाधा नहीं होगी। यह जयघोष ने अच्छे दिन आने की उम्मीद ही नहीं बढ़ाई बल्कि कांग्रेस की राजनीति से नाउम्मीद हो गये लोगों की आंखो में भी चमक पैदा कर दी। सब तरफ इस जीत का जश्न था। हर किसी को लग रहा था कि अब इस देश में राम राज्य की कल्पना सरकार हो जायेगी। नरेन्द्र मोदी अपने वादे के अनुरूप न केवल विदेशों से क...

आत्म-मुग्ध

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आत्म मुग्ध बीते पांच सालों में क्या हुआ यह जानने के पहले आपको दो हजार ग्यारह-बारह में जाना ही होगा। क्योंकि उसके पहले आप बीते पांच सालों को समझ ही नहीं पायेंगे? मेरी समझ में बीते पांच सालों में क्या हुआ इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विरूद्ध अन्ना हजारे और रामदेव बाबा के आंदोलन केखड़े होने से ही शुरू किया जाना चाहिए? शायद यह पहली बार था जब देश के लोगों ने सुना कि मनमोहन सिंह की सरकार गांधी परिवार के इशारे पर कठपुतली की तरह नाच रही है और देश का धन विदेशों में जमा करने वालों को संरक्षण दिया जा रहा है। लोकपाल तत्काल बनाना चाहिए। मनमोहन सरकार में भ्रष्टाचार बेगाबू हो गया है पाकिस्तान जैसे पिद्दी देश हमें आंख दिखा रहा है और आतंकवादियों तक को संरक्षण दिया जा रहा है। आतंकवादियों की मेहमान नवाजी हो रही है और कश्मीर में अलगाववादियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी तरह के सवाल इतने जोर शोर से अन्ना-बाबा ने न केवल उठाये बल्कि पूरे देश में रामदेव बाबा ने इसका घूम-घूम कर प्रचार किया। कैग की रिपोर्ट ने इस प्रचार को सत्यता का बल दिया और एक दिन बाबा ने इन मुद्दों को लेकर दिल्ली में धरना ...

झूठ-षडय़ंत्र

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मौजूदा समय में सच को पकडऩा दुश्वार हो गया है हालांकि रात कितनी भी गहरी और काली क्यों न हो सुबह जरूर आती है लेकिन विभिन्न राजनैतिक दलों के आईटी सेल ने सब गड्ड-मड्ड कर दिया है। वाक्या बहुत पहले का नहीं जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1987 में ईमेल से फोटो भेजने और उस रंगीन फोटो को दिल्ली के एक अखबार में छपने का दावा किया। इलेक्ट्रानिक मीडिया भी प्रधानमंत्री के इस दावे का  महिमामंडन करने लगे तभी अचानक पता चला कि इस देश में ईमेल की शुरूआत ही 1992 को हुई। फिर क्या था नरेन्द्र मोदी के दावे की खबर ही गायब कर दी गई। लेकिन सोशल मीडिया और वाट्सअप युनिर्वसिटी ने ऐसा मजाक बनाया कि इतना मजाक कभी की किसी प्रधानमंत्री का नहीं बना था। भले ही यह खबर मजाक बन गया हो लेकिन सच कहूं तो प्रधानमंत्री के इस दावे से मैं डर गया था क्योंकि हम लोग जिस इज्जत और शर्म का खुराक लेकर पले बढ़े है उसमें इस तरह से सार्वजनिक रूप से पकड़ाये जाने का मतलब समझ सकते हैं लेकिन सत्ता के लिए जिस तरह की बेशर्मी दिखाया गया है वह बचपने से सच और झूठ के संस्कार की घुट्टी के विपरित है। बचपन में झूठ बोलने वालों के लिए कह...

अल्प-विराम -3

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वाक्या बहुत पुराना नहीं है जब उड़ीसा में मारवाड़ी भगाओं अभियान चला। उड़ीसा के स्थानीय लोगों ने खूब हंगामा किया। मारकाट बलात्कार आगजनी सब कुछ हुआ। रातो रात सैकड़ो परिवार को उड़ीसा छोडऩा पड़ा। रायपुर के समता कालोनी में आज भी उनमें से दर्जनों परिवार रहते हैं। मामला तब बहुत सुर्खियों में रहा और विपक्षी पार्टियों ने बहुत हंगामा मचाया। इसके बाद शिवसेना ने पहले मुंबई फिर पूरे महाराष्ट्र में गैर मराठी लोगों के खिलाफ मोर्चा खोला यहां भी मार कुटाई से लेकर आगजनी हुई। असम में भी बिहारियों के खिलाफ कहर बपरा। ये सभी मामले उसी समय सुर्खियों में रहे लेकिन बाद में यह भी मुद्दा नहीं बना जबकि इन घटनाओं के हजारों पीडि़त भगाये जाने के बाद आज भी वापस नहीं लौटे। बस्तर में रमन सिंह की सरकार के दौरान सलवा जुडुम के नाम पर पांच सौ गांव उजड़ गये। यहां के हजारों आदिवासी आज भी राहत शिविरों में रह कर नारकीय जीवन जी रहे हैं लेकिन यह भी किसी राजनैतिक पाटी के एजेंडे में शामिल नहीं रहा। लेकिन दुर्भाग्य है कि कश्मीर में कश्मीरी पंडितो को भगाये जाने का मामला भारतीय जनता पार्टी और संघ के एजेंडे में है। कहने की जर...

अल्प-विराम -2

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कल बीस अप्रेल को पालाघर में तीन साधुओं की भीड़ ने हत्या कर दी । अख़लाक़ से पालाघर के इस सफ़र से किसका ख़ून नहीं खौलेगा ? हम कैसा देश बना रहे हैं , न्याय पालिका पर सवाल उठाते उठाते हम सड़क पर न्याय ढूँढने लगे और जब अपनी बारी आइ तो उसकी निंदा करने लगे , आख़िर नफ़रत की बीज तो हमी ने बोया है , क्या देश ऐसे ही चलेगा ? वैसे मेरी बात कई लोगों को बुरा लग सकता है लेकिन न्याय के लिए हम बापू को भी सड़क पर घसीट लाए थे झूठ और अफ़वाह फैलाकर स्वयम् को सही साबित करने की कोशिश उस ज़माने से करते आ रहे है आज जब देश का युवा बदल रहा है तो उनमें धर्म की आड़ में चल रहे कुप्रथा से बाहर निकलने की छटपटाहट साफ देखी जा सकती है। ढाबे-बार से लेकर हर जगह में हर समाज के युवा दिखने लगे हैं। जो न केवल धर्म से परे एक दूसरे के साथ कांधे से कांधा मिलाकर चलते है बल्कि आपसी सहयोग के लिए भी तत्पर रहते हैं। वे अपने समाज में व्याप्त बुराईयों का खुलकर विरोध भी करते हैं। ये अलग बात है कि सियासत उन्हें बार-बार वापस उनके अपने धर्म के साथ चिपकाये रखने के लिए एक माहौल बनाकर डराने की कोशिश करता है जिसके कारण वे सार्वजनिक रूप से ...

अल्प-विराम

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अल्प विराम यह सच है कि इन सत्तर सालों में सरकारों ने बहुत बेईमानी की। वोट की खातिर ऐसा कुछ किया जिससे सरकार की नियत पर सवाल उठाये जा सकते हैं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जिस मुस्लिम तुष्टिकरण को लेकर कांग्रेस बदनाम है वह मुसलमान भी कांग्रेस के साथ कहां है।उन्हें जब भी कांग्रेस का विकल्प मिला वह उनके साथ चले गये। देश के सबसे बड़े सूबा उत्तरप्रदेश में मुसलमान सपा-बसपा के साथ है तो बिहार मे लालू नीतिश के साथ हर प्रदेश में मुसलमान क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ खड़ा है लेकिन धर्म निरपेक्ष की दुहाई देता कांग्रेस का मतदाताओं पर पकड़ कमजोर होता चला गया। यह मसला मैं इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि जिस धर्मनिरपेक्ष की दुहाई के दम पर भारत का संविधान खड़ा है वह एक तरह से गाली बना दिया गया है। वक्त के साथ बहुत कुछ बदला है और इस बदलाव की अनदेखी ने ही हमारे सामाजिक ताने-बाने पर प्रहार किया हैं। इसलिए  मैं वक्त को कुछ पीछे ले जाकर सोचने की कोशिश कर रहा था कि आखिर मौजूदा हालात के लिए सिर्फ सावरकर या संघ दोषी है ? या कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण भी दोषी है। आजादी के 70 सालों में हमने कई मामलों में विश्...