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आत्म-मुग्ध

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आत्म मुग्ध बीते पांच सालों में क्या हुआ यह जानने के पहले आपको दो हजार ग्यारह-बारह में जाना ही होगा। क्योंकि उसके पहले आप बीते पांच सालों को समझ ही नहीं पायेंगे? मेरी समझ में बीते पांच सालों में क्या हुआ इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विरूद्ध अन्ना हजारे और रामदेव बाबा के आंदोलन केखड़े होने से ही शुरू किया जाना चाहिए? शायद यह पहली बार था जब देश के लोगों ने सुना कि मनमोहन सिंह की सरकार गांधी परिवार के इशारे पर कठपुतली की तरह नाच रही है और देश का धन विदेशों में जमा करने वालों को संरक्षण दिया जा रहा है। लोकपाल तत्काल बनाना चाहिए। मनमोहन सरकार में भ्रष्टाचार बेगाबू हो गया है पाकिस्तान जैसे पिद्दी देश हमें आंख दिखा रहा है और आतंकवादियों तक को संरक्षण दिया जा रहा है। आतंकवादियों की मेहमान नवाजी हो रही है और कश्मीर में अलगाववादियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी तरह के सवाल इतने जोर शोर से अन्ना-बाबा ने न केवल उठाये बल्कि पूरे देश में रामदेव बाबा ने इसका घूम-घूम कर प्रचार किया। कैग की रिपोर्ट ने इस प्रचार को सत्यता का बल दिया और एक दिन बाबा ने इन मुद्दों को लेकर दिल्ली में धरना ...

झूठ-षडय़ंत्र

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मौजूदा समय में सच को पकडऩा दुश्वार हो गया है हालांकि रात कितनी भी गहरी और काली क्यों न हो सुबह जरूर आती है लेकिन विभिन्न राजनैतिक दलों के आईटी सेल ने सब गड्ड-मड्ड कर दिया है। वाक्या बहुत पहले का नहीं जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1987 में ईमेल से फोटो भेजने और उस रंगीन फोटो को दिल्ली के एक अखबार में छपने का दावा किया। इलेक्ट्रानिक मीडिया भी प्रधानमंत्री के इस दावे का  महिमामंडन करने लगे तभी अचानक पता चला कि इस देश में ईमेल की शुरूआत ही 1992 को हुई। फिर क्या था नरेन्द्र मोदी के दावे की खबर ही गायब कर दी गई। लेकिन सोशल मीडिया और वाट्सअप युनिर्वसिटी ने ऐसा मजाक बनाया कि इतना मजाक कभी की किसी प्रधानमंत्री का नहीं बना था। भले ही यह खबर मजाक बन गया हो लेकिन सच कहूं तो प्रधानमंत्री के इस दावे से मैं डर गया था क्योंकि हम लोग जिस इज्जत और शर्म का खुराक लेकर पले बढ़े है उसमें इस तरह से सार्वजनिक रूप से पकड़ाये जाने का मतलब समझ सकते हैं लेकिन सत्ता के लिए जिस तरह की बेशर्मी दिखाया गया है वह बचपने से सच और झूठ के संस्कार की घुट्टी के विपरित है। बचपन में झूठ बोलने वालों के लिए कह...