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अल्प-विराम -2

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कल बीस अप्रेल को पालाघर में तीन साधुओं की भीड़ ने हत्या कर दी । अख़लाक़ से पालाघर के इस सफ़र से किसका ख़ून नहीं खौलेगा ? हम कैसा देश बना रहे हैं , न्याय पालिका पर सवाल उठाते उठाते हम सड़क पर न्याय ढूँढने लगे और जब अपनी बारी आइ तो उसकी निंदा करने लगे , आख़िर नफ़रत की बीज तो हमी ने बोया है , क्या देश ऐसे ही चलेगा ? वैसे मेरी बात कई लोगों को बुरा लग सकता है लेकिन न्याय के लिए हम बापू को भी सड़क पर घसीट लाए थे झूठ और अफ़वाह फैलाकर स्वयम् को सही साबित करने की कोशिश उस ज़माने से करते आ रहे है आज जब देश का युवा बदल रहा है तो उनमें धर्म की आड़ में चल रहे कुप्रथा से बाहर निकलने की छटपटाहट साफ देखी जा सकती है। ढाबे-बार से लेकर हर जगह में हर समाज के युवा दिखने लगे हैं। जो न केवल धर्म से परे एक दूसरे के साथ कांधे से कांधा मिलाकर चलते है बल्कि आपसी सहयोग के लिए भी तत्पर रहते हैं। वे अपने समाज में व्याप्त बुराईयों का खुलकर विरोध भी करते हैं। ये अलग बात है कि सियासत उन्हें बार-बार वापस उनके अपने धर्म के साथ चिपकाये रखने के लिए एक माहौल बनाकर डराने की कोशिश करता है जिसके कारण वे सार्वजनिक रूप से ...