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नफरत की ताकत...

 आज पूरे विश्व की निगाह जब भारत में हो रहे लोकसभा चुनाव पर टिकी हो तब हमारे नेताओं की भाषा ने भारत की पहचान बनाने की जो कोशिश की है वह बेहद शर्मनाक है। किसने किसे गाली दी, किसने किसे छोड़ दिया इस पर चल रही प्रतिस्पर्धा के बीच भाषा की मर्यादा ही नहीं बची है।  गांधी के इस देश में इस बार के चुनाव में सारी मर्यादाएं लांघ दी जायेगी इसका संकेत तो पहले ही मिलने लगा था। लेकिन तब कौन जानता था कि सत्ता संघर्ष के इस महाभारत में सब कुछ समाप्त कर दिये जाने की तैयारी कर ली गई है। हालांकि नफरत की ताकत को हर बार प्यार के सामने झुकना पड़ा है इसलिए संसद में जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गले लगाते हुए जब कहा कि आप गाली देते रहो हम तो प्यार करते रहेंगे तो कुंभर नारायण की कविता की वह पंक्ति कईयों के जेहन मे रही होगी- टक अजीब सी मैं दूं इन दिनों मेरी भरपूर नफरत करने की ताकत दिनों दिन क्षीण पड़ती जा रही है  अंग्रेजो से नफरत करना चाहता जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया तो शेम्स पीयर आड़े आ जाते जिनके मुझपर न जाने कितने अहसान है मुसलमानों से नफरत करने चलता तो सामने गालिब आकर खड़े...

फ़ैसले की वजह

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फ़ैसले की वजह कोई सोच भी नहीं सकता था कि फ़ैसला ऐसा आएगा , लेकिन फ़ैसला तो आ ही गया था । इस फ़ैसले ने कितने ही लोगों की नींद उड़ा दी । हलाकान कर देने वाली गर्मी में इस फ़ैसले का क्या मतलब हो सकता था , जो लोग सोचते थे मोदी की वापसी किसी भी हाल में नहीं होगी उनका अंक गणित धरा का धरा रह गया। ख़ुद भाजपा ए जो लोग नाउम्मीद पाले बैठे थे, वे भी इस कथित करिश्माई जीत से हैरान थे । जिस बंगाल और उड़ीसा से सत्ता की जादुई आँकड़े की भरपाई की उम्मीद की जा रही थी, उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। हाँ, लेकिन उड़ीसा बंगाल भी फ़ैसले के साथ थे । फ़ैसले को लेकर लोकतंत्र में सवाल उठाना ही ग़लत मान लिया गया है , इसलिए इस फ़ैसले पर सवाल उठाने से पहले ही भक्तों ने मज़ाक़ उड़ाना शुरू कर दिया था। हालत यह हो गई कि हिजड़े तक पर्दा करने लग गए । एक डर और नाउम्मीदी के बीच आए इस फ़ैसले की वजह क्या हो सकती है? सबके अपने दावे है , लेकिन खुलकर कहने के एतराज़ ने लोकतंत्र के इस सबसे बड़े देश में भविष्य के ख़तरे की ओर आगाह तो कर ही दिया है। जीत एक ऐसा उन्माद है जो विरोधियों को बर्फ़ कर दे, लेकिन कभी न कभी तो इस फ़ैसले की वजह ढू...

उन्माद-2

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वह शाम अजीब था। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। बाहर हवाएं गर्म जरूर थी लेकिन कॉफी हाऊस के एयर कंडीशन में बैठे लोग सुकून से काफी की चुस्कियों के साथ अपने में मशगुल थे। मैं भी एक टेबल पर अकेले ही बैठा था। सोच रहा था कि कॉफी मंगाऊ या किसी के आने का इंतजार करूं। अकेले कॉफी पीने की मेरी आदत नहीं रही लेकिन पिछले कुछ माह में मुझे तीन-चार बार कॉफी अकेले ही पीना पड़ा था। ऐसा पिछले 15-20 सालों में भी तीन-चार बार नहीं हुआ था लेकिन सब कुछ सहज दिखने के बाद भी कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था। एक-दूसरे से कटे-कटे से लोग, सामना होते ही असहज महसूस करने लगे थे। थोड़ी देर में संतोष जी आ गये। उनका आना अच्छा लगा। कभी रोज आने वाले संतोष जी इन दिनों बहुत कम आते थे। हालांकि वे इसकी वराह उनकी अपनी पारिवारिक दिक्कत बताते थे। कुछ भी हो समझदार और अनुभवी संतोष जी की मैं ही नहीं अमूमन यहां के बहुत से लोग बेहद इज्जत करते थे। एक स्थानीय अखबार के संपादक होने के अलावा वे कई बड़े अखबारों में काम कर चुके थे। हालांकि मेरा उनसे कॉफी हाउस से पहले का संबंध या परिचय कुछ भी कहा जा सकता है। उनसे मेरी एक अखबार में नौकरी के दौरान हल्क...

भूमिका

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भूमिका यह रिपोर्ट खुद के आसपास होने वाली घटना का ऐसा सच है जो हैरान कर देती है। स्वयं को सांस्कृतिक संगठन के तौर पर स्थापित इस संगठन से जुड़ी वह घटनाएं जो हमें सोचने पर  मजूबर कर देती है कि हम आज भी किस पुरातन सदी से चिपके बैठे है। आदमी के भीतर की आहमियत को किस हद तक कैसे मारे जाने का उपक्रम होता है और अपनी सुविधानुसार परिभाषा गढ़ी जाती है ताकि अपना मतलब हल किया जा सके। आजादी के पहले और इसके बाद इस देश में क्या हुआ ? और किस तरह से राजनैतिक सत्ता ने भारतीय परम्परा से इतर अपना एजेंडा लागू करने की कोशिश में मानवता, नैतिकता, राष्ट्रभक्ति और मान्य परम्पराओं का चिरहरण किया। यह किसी से छिपा नहीं रहा लेकिन क्या यह सब हिटलर के राष्ट्रप्रेम से प्रेरित था?  पूरा देश जानता है कि जब किसी का इतिहास नफरत से भरा हो तो वर्तमान में उस बीज से प्रेम का कोपल  फ़ुटने की उम्मीद ही बेमानी है फिर भी हम धर्म और राष्ट्रवाद की आग में उस पतंगे की तरह झुलसने तैयार हैं। क्या हम राजनाति में दूसरी विचारधारा से असहमति पर हिसंक हो सकते है? क्या जो हमें पसंद नहीं उसे समूल नष्ट करके ही अपनी विचारधारा ...