नफ़रत और प्यार
नफरत और प्यार राजधानी की कभी नहीं थमने वाली रफ्तार अब भी बरकरार थी। भाईचारे पर कभी कोई हावी नहीं हो पाया। जिससे भी मिलते उसके पास नई कहानी होती थी। इसलिए जब उस दिन जयस्तंभ में खड़े गपियाते लोगों में से संजय ने जब कहा कि यह चुनाव किसी जंग से कम नहीं । सरदार जी कहा चुप बैठने वाले थे उसने भी कह दिया कि आने वाले दिनों में लोग कहेंगे कुछ भी हो यार ऐसा मनोरंजन देने वाला प्रधानमंत्री फिर दुबारा नहीं मिलेगा। कॉफी हाऊस से उलट जयस्तंभ में इसी तरह की बात होती थी। हंसी हंसी में गंभीर मुद्दों पर कटाक्ष करने की सबकी अपनी शैली थी। तभी तो प्रज्ञा ठाकुर के महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताये जाने पर जब कुछ भाजपा समर्थकों ने माफी मांग लेने के बाद मामला समाप्त हो जाने का दावा किया तो कमल ने बड़े धीरे से कहा था एक बात समझ नहीं आता कि गोडसे के समर्थक भाजपा लॉबी के ही क्यों होते हैं। कमल के इस सवाल पर सब चौक गये थे हालांकि इसका ठीक ठीक जवाब भी वहीं मौजूद भाजपा या संघ के समर्थकों के पास भी नहीं था। लेकिन यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब न होते हुए भी सबके पास है। महात्मागांधी की शहादत को 70...