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नफ़रत और प्यार -2

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नफरत की राजनीति का ऐसे कई उदाहरण है। इनमें से कई देश को शर्मसार कर देने वाला है। चुनावों में विरोधी नेताओं की सभा और रैलियों मे जिस तरह से भाजपा कार्यकर्ताओं ने मोदी मोदी के नारे लगाकर बाधा डालने की कोशिश की है वह भी भारत के स्वस्थ चुनाव परम्परा के विपरित है और यह सब हंगामा खड़ा करने का मकसद यहीं माना जाए। सत्ता की ताकत होने के बाद तो उग्रता ही बढऩे लगी थी। हालात यह होने लगा कि मोदी की आलोचना की ही नहीं जा सकती और जो भी मोदी सरकार की आलोचना करेगा उसकी खैर नहीं। आप समझ ही नहीं सकते कि उनकी सोच क्या करने जा रही है। ये इस देश के बहुधर्मी भाईचारे, एकता में अनेकता और संविधान सब कुछ समाप्त कर देना चाहते है। कमल के इस कथन पर भले ही संतोष जी को बुरा लगा लेकिन मैं कमल के इस तीखे तेवर से असहज हो गया था। आखिर संतोष जी की मैं बहुत इज्जत करता था और हमारे बीच कभी भी कोई भी चर्चा बहस के स्तर तक भी नहीं पहुंच सकी थी। कमल बेहद आक्रोशित था। सुप्रीम कोर्ट के पांच पांच जज प्रेसवार्ता लेने सामने आ गये थे और यह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय था। लेकिन इस मामले में मोदी सरकार का रवैया सचमुच हैरान क...

नफ़रत और प्यार

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नफरत और प्यार राजधानी की कभी नहीं थमने वाली रफ्तार अब भी बरकरार थी। भाईचारे पर कभी कोई हावी नहीं हो पाया। जिससे भी मिलते उसके पास नई कहानी होती थी। इसलिए जब उस दिन जयस्तंभ में खड़े गपियाते लोगों में से संजय ने जब कहा कि यह चुनाव किसी जंग से कम नहीं । सरदार जी कहा चुप बैठने वाले थे उसने भी कह दिया कि आने वाले दिनों में लोग कहेंगे कुछ भी हो यार ऐसा मनोरंजन देने वाला प्रधानमंत्री फिर दुबारा नहीं मिलेगा। कॉफी हाऊस से उलट जयस्तंभ में इसी तरह की बात होती थी। हंसी हंसी में गंभीर मुद्दों पर कटाक्ष करने की सबकी अपनी शैली थी। तभी तो प्रज्ञा ठाकुर के महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताये जाने पर जब कुछ भाजपा समर्थकों ने माफी मांग लेने के बाद मामला समाप्त हो जाने का दावा किया तो कमल ने बड़े धीरे से कहा था एक बात समझ नहीं आता कि गोडसे के समर्थक भाजपा लॉबी के ही क्यों होते हैं। कमल के इस सवाल पर सब चौक गये थे हालांकि इसका ठीक ठीक जवाब भी वहीं मौजूद भाजपा या संघ के समर्थकों के पास भी नहीं था। लेकिन यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब न होते हुए भी सबके पास है। महात्मागांधी की शहादत को 70...

राष्ट्रधर्म और धर्म

पाकिस्तान के बालाकोट के हमले के बाद तो राकेश ने भाजपा को इस तरह से पेश करना शुरू कर दिया मानों भाजपा के अलावा इस देश में दूसरा कोई राष्ट्रवादी ही नहीं है। वह चिखचिख कर करने लगा कि मोदी है तो मुमकिन है। इस हमले के बाद बताया जाने लगा कि पाकिस्तान थर थर कांपने लगा है। पाकिस्तान बरबाद हो गया है और अब वह भारत पर आतंकवादी हमले का दुस्साहस नहीं करेगा। सीमा पार से गोलीबारी बंद हो जायेगी। राष्ट्रवाद का उफान भाजपाईयों में सर चढ़कर बोलने लगा था लेकिन मुकेश ने कहा देखना पाकिस्तान कभी भी अपनी हरकत से बाज नहीं आने वाला है न सीमापार से गोलीबारी बंद होगी और न ही आतंकवादी गतिविधियां ही समाप्त होने वाली है। मैने मुकेश से इसकी वजह पूछी तो उन्होंने बेबाकी से कहा कि जो देश 1971 में बुरी तरह पराजित हुआ हो। जिस देश के दो टुकड़े कर एक लाख सैनिकों को आत्मसमर्पण करना पड़ा हो। यह एक ऐसा अपमानजनक स्थिति है जो उसे चैन से बैठने नहीं देगा। यही वजह है कि वह कभी पंजाब के रास्ते तो कभी कश्मीर के रास्ते भारत को परेशान करता है। मुकेश ने 80 के दशक के खालिस्तान समर्थकों को पाकिस्तान से मिलने वाली मदद का भी खुलासा करके...

कट्टरता और श्रेष्ठता -3

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धार्मिक कट्टरता मेरे लिए स्याह सुरंग में बैठे उस व्यक्ति की तरह था जो अपने वजूद बचाने ईश्वर से लगातार विनती भी करता है और जरा सी आहट या अनहोनी की निर्मूल आशंका पर हमालवर हो जाता है। मुस्लिम शासको का अत्याचार आज भी राजनीति का केन्द्र बिन्दु बन जाता था। यह बात कोई भी मानने को तैयार नहीं था या किसी ने यह समझने की कोशिश नहीं की कि राजतंत्र का मलतब ही गलत था इसलिए तो लोकतंत्र की स्थापना हुई है। हिन्दूवादी संगठनों ने स्वयं को राजनैतिक सत्ता में स्थापित करने जिस राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की दुहाई देते थे उसमें कहीं न कहीं ईसाईयों का धर्मान्तरण और मुस्लिमों का शरीयत कानून को जिम्मेदार बताया जाता था। यह भी सच है कि इन दिनों बहु विवाह और ज्यादा बच्चा पैदा करने से मुस्लिम भी पीछे छूट चुका था वे समय के साथ शिक्षित हो चुके थे और वे भी दो से ज्यादा बच्चे न तो पैदा करते थे और न ही चार शादियां करते न ही हममें से किसी को कोई मुस्लिम दिखा था। लेकिन भाजपा की राजनीति की शुरूआत ही कई बार इसी मसले से शुरू होती थी। मुस्लिमों की बढ़ती आबादी से हिन्दुत्व को खतरा दिखाया जाता था और इसके समर्थन में प्रवीण तोगडि...

कट्टरता और श्रेष्ठता-2

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मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे उन लोगों के मन में बैठे डर को दूर करूं जो यह तय कर चुके है कि मोदी सरकार आई तो उनका नुकसान होगा या नहीं आई तो यह देश एक और मुस्लिम राष्ट्र की तरफ कदम बढ़ायेगा। राकेश विनय ही नहीं शहर में कितने ही लोग थे जो इस डर को हवा दे रहे थे और इस पूरी कहानी में हर उस घटना को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा था जिसमें दोनों ही धर्म के लोग जुड़े थे। मसलन राकेश को कश्मीर से भगाये कश्मीरी पंडित तो दिखाई देता था लेकिन उड़ीसा में चले मारवाड़ी भगाओं आंदोलन या आमचीं मुंबई के तहत गैर महाराष्ट्रियनो पर अत्याचार का सलवा जुडुम में खाली हुए पांच सौ गांव इसलिए राकेश को नहीं दिखलाई देता था क्योंकि उसमें मुसलमान या ईसाई नहीं होते थे। हिन्दू लड़के के हिन्दू लड़की को प्यार या शादी के नाम पर धोखे का मामला उस ढंग से कभी नहीं उभारा गया जिस ढंग से लव जेहाद के नाम पर अभियान चलाया गया। बलात्कार के मामले मे भी घटना में राजनैतिक फायदे देखे जाने लगे तो लगने लगा था कि हम किस तरह का भारत निर्माण कर रहे हैं। ऐसा लगता कि लोगों के दिलों दिमाग में इसे न केवल बैठा दिया गया है बल्कि उसे किसी बीज ...

कट्टरता और श्रेष्ठता

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  छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है 'पेलिहा संग पंगनहा हारय या मुर्गी की एक टांग । कट्टरता के लिए यह कहावत पर्याप्त है या नहीं इस पर जिसे विचार करना है करता रहे। लेकिन मुझे लगता है कट्टरता भी एक तरह से उन्माद की तरह हिंसक शब्द हैं जो कभी भी किसी भी हाल में समाज के लिए उचित नहीं है। खासकर धार्मिक कट्टरता तो समाज को जोडऩे की बजाय तोडऩे का काम ही किया है। वह दूसरे धर्म को कम अपने धर्म के लोगों को अधिक तोड़ता है और समाज में जो बेतुकापन दिखाई देता है उसकी ज्यादातर वजह धार्मिक कट्टरता ही है और यह धार्मिक कट्टरता जब राजनीति में स्थान पा लेता है तो समस्या विकराल हो जाती है। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा के समय से ही राजनैतिक सत्ता के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जाने लगा। सावरकर का तो साफ तौर पर मत था कि राजनीति का हिन्दूकरण और फिर हिन्दुओं का सैनिकीकरण किया जाना चाहिए। सैनिकीकरण का मतलब ही कोई साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है। सावरकर का हिन्दुत्व कट्टरता की वजह से भारतीय जनमानस को राजनैतिक रूप से स्वीकार नहीं हो पाया। तब सावरकर से कुछ अलग हटकर आरएसएस ने राजनीति के हिन्दुकरण की शुरूआत की थी। जनसंघ ...

उन्माद -3

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लू शैतानी हवा होती है, जो किसी को नहीं बख़्सती और हिन्दूत्व की जो लू चलाने की कोशिश हो रही थी वह आरएसएस की हवा से अलग सावरकर के हिन्दूत्व की हवा अधिक थी। लेकिन इस बात को न सूरज कुमार मानने को तैयार थे और न ही संतोष जी ही स्वीकार कर रहे थे। अकिल के लिए तो यह एकदम ही असहज था। उसने दो चार लोगों को छोड़ बाकी से बातचीत ही बंद कर दी थी और दूसरे टेबलो से आने वाली आवाजों को वे स्वयं के लिए व्यंग्य बाण चलाने की बात कत कह देते थे। यह भी सच है कि अकिल दूसरों के बनिस्बद अपने धर्म के प्रति ज्यादा कट्टर थे और वे ऐसे मसलो पर जल्द ही क्रोधित हो जाते थे। अकिल साफ कहता था कि जब धर्म में इज्तिहाद की अनुमति ही नहीं है तो फिर इस पर चर्चा ही बेकार है। इज्तिहाद का अर्थ है मूल ग्रंथों की व्याख्या करने का अधिकार। और पैगम्बर साहेब के मृत्यु के बाद कलमा ने यह फरमान जारी किया कि इज्तिहाद के दरवाजे बंद हो चुकी है। कलमा ने ऐसा करने की वजह बताई कि चूंकि ऐसा कोई पाक मुसलमान नहीं बचे है जो विश्वसनीय व्याख्या कर सके इसलिए आगे से ये फायदा रहेगा कि मूल ग्रंथो का अक्षरश पालन किया जायेगा। हालांकि इस बात से सलीम हसन इत्...